श्री गणेशायनम:

॥ वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ , निर्विघ्नं कुरुमे देव सर्व कार्येषु सर्वदा ॥

Tuesday, 1 March 2016

यथा ह्येकेन चक्रेण न रथस्य गतिर्भवेत् |
एवं परुषकारेण विना दैवं न सिद्ध्यति ||
अर्थात् : जैसे एक पहिये से रथ नहीं चल सकता है उसी प्रकार बिना पुरुषार्थ के भाग्य सिद्ध नहीं हो सकता है |

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