श्री गणेशायनम:

॥ वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ , निर्विघ्नं कुरुमे देव सर्व कार्येषु सर्वदा ॥

Friday, 12 February 2016

अलसस्य कुतो विद्या , अविद्यस्य कुतो धनम् |
अधनस्य कुतो मित्रम् , अमित्रस्य कुतः सुखम् ||
अर्थात् : आलसी को विद्या कहाँ अनपढ़ / मूर्ख को धन कहाँ निर्धन को मित्र कहाँ और अमित्र को सुख कहाँ |

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